कि अब तो वा'दा निभाना भी रायगाँ है सखी

सो तेरा हिज्र मनाना भी रायगाँ है सखी

जो मेरे हाल पे रोती नहीं तो लगता है
के तुझ से नजरें मिलाना भी रायगाँ है सखी

तुम्हारे शहर से जाते हुऐ यही सोचुँ जानाँ
कि तेरे शहर में आना भी रायगाँ है सखी

जो बात बात पे कहती थी ज़िंदगी हो तुम
अब उस की वज्द में आना भी रायगाँ है सखी

हसीन चेहरे मोहब्बत का ढ़ोंग करते हैं
सो ऐसे शख्श़ को पाना भी रायगाँ है सखी

— Md Akhter Ansari

More by Md Akhter Ansari

Other ghazal from the same pen

See all from Md Akhter Ansari →

Poverty Shayari

Shers of poverty.

All Poverty Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling