क्या हुआ जो मुहब्बत मिली ही नहीं
शा'इरी का सबब आशिक़ी ही नहीं
संग उस के हवा में ही उड़ता हूँ मैं
देख न्यूटन यहाँ ग्रेविटी ही नहीं
फ़िल्म में कुछ मरम्मत ज़रूरी तो है
एन्ड में बे-वफ़ा तो मरी ही नहीं
आज भी जब दुशासन हुकूमत में हैं
कैसे मानू कहीं द्रौपदी ही नहीं
तीसरे शख़्स ने ही बुझाया मुझे
दरमियाँ में हवा कोई थी ही नहीं
आप होंगे समुंदर मुझे इस से क्या
मेरे अंदर कहीं तिश्नगी ही नहीं
ऐसी हालत में देखा था दार-ओ-रसन
फिर सज़ा भी सज़ा सी लगी ही नहीं
— Akhil Saxena















