kah do koi saaqi se ki ham marte hain pyaase | कह दो कोई साक़ी से कि हम मरते हैं प्यासे

  - Altaf Hussain Hali

कह दो कोई साक़ी से कि हम मरते हैं प्यासे
गर मय नहीं दे ज़हर ही का जाम बला से

जो कुछ है सो है उस के तग़ाफ़ुल की शिकायत
क़ासिदस है तकरार न झगड़ा है सबास

दल्लाला ने उम्मीद दिलाई तो है लेकिन
देते नहीं कुछ दिल को तसल्ली ये दिलासे

है वस्ल तो तक़दीर के हाथ ऐ शह-ए-ख़ूबाँ
याँ हैं तो फ़क़त तेरी मोहब्बत के हैं प्यासे

प्यासे तिरे सर-गश्ता हैं जो राह-ए-तलब में
होंटों को वो करते नहीं तर आब-ए-बक़ा से

दर गुज़रे दवा से तो भरोसे पे दुआ के
दर गुज़रें दुआ से भी दुआ है ये ख़ुदास

इक दर्द हो बस आठ पहर दिल में कि जिस को
तख़फ़ीफ़ दवा से हो न तस्कीन दुआ से

'हाली' दिल-ए-इंसाँ में है गुम दौलत-ए-कौनैन
शर्मिंदा हों क्यूँँ ग़ैर के एहसान-ओ-अता से

जब वक़्त पड़े दीजिए दस्तक दर-ए-दिल पर
झुकिए फ़ुक़रा से न झम
किए उमरा से

  - Altaf Hussain Hali

Visaal Shayari

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