रात-भर ख़्वाब में जलना भी इक बीमारी है इश्क़ की आग से बचने में समझदारी है
वक़्त मिलता ही नहीं है मुझे तन्हाई से
जंग ख़ुद से ही मिरी आज तलक जारी है
आइने घर के सभी टूट चुके हैं कब के
रू-ब-रू ख़ुद से ही होना भी मुझे भारी है
मेरी ये बात तू माने या न माने लेकिन
बिन तिरे दुनिया में जीना भी अदाकारी है
दर्द तन्हाई तड़प अश्क मोहब्बत यारी
'मीत' इन सब में ही उस ग़म की तरफ़-दारी है
— Amit Sharma Meet















