बुलंदी देर तक उस शख़्स के हिस्से में रहती है

कि जिस की माँ दुआएँ माँगती सजदे में रहती है

भला क्या मोल दे सकता हूँ मैं अनमोल ममता का
मुझे देकर निवाला माँ मेरी रोज़े में रहती है

ये अपनी माँ के जैसा है मुझे वो देख के बोले
मेरी माँ की हसीं सूरत मेरे चेहरे में रहती है

जहाँ वा'दा दिया था लौट आने का मुझे तुम ने
नज़र मेरी बिछी हर पल उसी रस्ते में रहती है

सभी गुल गुल-सिताँ के साथ होते हैं मगर फिर भी
खड़ी गुम-सुम अकेली इक कली गमले में रहती है

यहाँ तुम लौट कर आई नहीं फिर से कभी लेकिन
तुम्हारी याद इस घर के हर इक कमरे में रहती है

मुझे साइल समझने की न जस्सर भूल तुम करना
ज़माने भर की हर दौलत मेरे क़ासे में रहती है

— Avtar Singh Jasser

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