रंज-ओ-ग़म को आश्ना जिसने बनाया है मेरा
आज तक क्यों शख़्स वो ही अक्स-ओ-साया है मेरा
मेरे दिल ने था सजाया ख़्वाब जिस लड़की का कल
आज उस लड़की ने ही कमरा सजाया है मेरा
बाक़ी हर इक शख़्स की औक़ात से बाहर रहूँ
दाम उसने इस लिए ज़्यादा लगाया है मेरा
कम सुख़न लहजे को अपने मैं बदल तो दूँ मगर
ऐब हर इक बस इसी फ़न ने छुपाया है मेरा
मेरी सारी उँगलियाँ जिनको बचाने में जलीं
उन चिराग़ों ने ही "जस्सर" घर जलाया है मेरा
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