chain kii bansi bajee to zindagi achchhii lagii | चैन की बंसी बजी तो ज़िंदगी अच्छी लगी

  - Dharmesh bashar

चैन की बंसी बजी तो ज़िंदगी अच्छी लगी
सर्दियों की रुत में जैसे धूप थी अच्छी लगी

बंदिश-ए-रहबर से बच कर यूँँ ही बस घूमा ज़रा
कुछ घड़ी की ही सही आवारगी अच्छी लगी

दुश्मनों ने दिल में जो था बे-झिझक मुझ सेे कहाँ
पुर-तकल्लुफ़ दोस्ती से दुश्मनी अच्छी लगी

ख़ूब ता'रीफ़ें वहाँ थीं या गिले या तोहमतें
मुझको उस महफ़िल में अपनी ख़ामुशी अच्छी लगी

बात कुछ कह दी लबों से कुछ थी आँखों में निहाँ
जो कही उस सेे ज़ियादा अनकही अच्छी लगी

आरज़ू अब है बहारों की न है ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ
बे-नियाज़ी मुझको सूखे पेड़ की अच्छी लगी

ज़िंदगी की मुश्किलों से कुछ मुसलसल जूझते
और कुछ ऐसे भी जिनको ख़ुदकुशी अच्छी लगी

चाँदनी भी जी जलाती थी 'बशर' परदेस में
लौट कर मुझको वतन की धूप भी अच्छी लगी

  - Dharmesh bashar

Ujaala Shayari

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