तुम से मिलना भी नहीं तुम से बिछड़ना भी नहीं
वक़्त के जैसे मगर हम को बदलना भी नहीं
इश्क़ ने फिर हमें इक बार है बख़्शा सहरा
दरिया मिलना भी नहीं अब्र बरसना भी नहीं
बड़ी मुश्किल से छुपाते हैं ज़माने से तुम्हें
ज़ख़्म रिस्ना भी है और आँख को गलना भी नहीं
वो कहीं दूर बहुत दूर गया है मुझ से
उस को आना भी नहीं हम को मचलना भी नहीं
सर में बैठी है अना सीने में चुभती बातें
गले मिलते हैं मगर दिल कभी मिलना भी नहीं
ख़्वाब पैरों तले शानों पे है ज़िम्मे-दारी
हम को उड़ना भी है पंखों को निकलना भी नहीं
ज़ब्त के जिस्म में रहने दो मिरी ज़ात को तुम
मैं जो बिगड़ा तो मैं दुनिया से सँभलना भी नहीं
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