ख़िज़ाँ का ज़िक्र न ज़िक्र-ए-बहार करते रहे
तुझी को तेरी निगाहों से प्यार करते रहे
मता-ए-दर्द कि बढ़ती रही न जाने क्यूँ
इलाज-ए-दर्द मिरे ग़म-गुसार करते रहे
दयार-ए-हुस्न के जल्वे थे ख़ूब-तर लेकिन
मिरी नज़र के लिए इंतिज़ार करते रहे
मुझे तो रक़्स-ए-मसाइब भी रास आ न सके
वो बज़्म-हा-ए-सुरूद-ओ-सितार करते रहे
कभी यक़ीन-ए-मोहब्बत न था न है लेकिन
फ़रेब-ख़ुर्दा तिरा ए'तिबार करते रहे
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