हौसला भी और क्या है वक़्त का बस खेल है
रूह है आज़ाद पंछी और पैकर जेल है
क्या कहूँ क्या मिल गया इस शा'इरी के शौक़ से
पेट को जो चाहिए वो लूण आटा तेल है
हाथ था
में बाप का निकली थी जो रफ़्तार से
आज पटरी से उतरती ज़िन्दगी की रेल है
कुछ अधूरे सपने मेरे कुछ अधूरी ख़्वाहिशें
और हर दिन उनपे पड़ता थोड़ा मिट्टी तेल है
आँसू की क़ीमत ज़ियादा दर्द की है कम रखी
आज रेणू भी लगाती छोटी सी इक सेल है
— Renuka Vyas















