tujh badan par jo laal saari hai | तुझ बदन पर जो लाल सारी है

  - Faez Dehlvi

तुझ बदन पर जो लाल सारी है
अक़्ल उस ने मिरी बिसारी है

बाल देखे हैं जब सूँ मैं तेरे
ज़ुल्फ़ सी दिल कूँ बे-क़रारी है

क़द अलिफ़ सा हुआ मिरा जि
यूँँ दाल 'इश्क़ का बोझ सख़्त भारी है

सब के सीने को छेद डाला है
पल्क तेरी मगर कटारी है

ओढ़नी ऊदी पर कनारी ज़र्द
गिर्द शब के सुरज की धारी है

क़हर ओ लुत्फ़ ओ तबस्सुम-ओ-ख़ंदा
तेरी हर इक अदा पियारी है

तिरछी नज़राँ सूँ देखना हँस हँस
मोर से चाल तुझ नियारी है

ज़िंदा 'फ़ाएज़' का दिल हुआ तुझ सूँ
हुस्न तेरा बी फ़ैज़-ए-बारी है

  - Faez Dehlvi

Nazakat Shayari

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