तुम को जो मुझ से शिकायत है कि शिकवा न करो

बंदा-पर्वर हमें हर रोज़ सताया न करो

मेहंदी मल कर तो न आने का बहाना न करो
आज है वस्ल की शब ख़ून-ए-तमन्ना न करो

तुम निकालो मिरे अरमाँ मिरा मतलब ये नहीं
मुझ को कहना तो ये है ग़ैर का कहना न करो

तौबा तौबा मय-ए-उल्फ़त को बताते हो हराम
बे-पिए शैख़ जी इस तरह से बहका न करो

मैं कहूँगा तुम्हें ज़ालिम जो सताओगे मुझे
तुम जो ये सुन नहीं सकते हो तो ऐसा न करो

हाँ मिरे हुस्न की ता'रीफ़ पे चिढ़ते हो अगर
आईना देख के फिर तुम मुझे देखा न करो

अपने आशिक़ से मुनासिब नहीं इस तरह हिजाब
आओ आँखों में मिरी शौक़ से पर्दा न करो

दे गए आलम-ए-रूया में ये तस्कीन मुझे
ज़ब्त उल्फ़त में है लाज़िम तुम्हें रोया न करो

क्या ग़लत है ये रक़ीबों से नहीं रब्त तुम्हें
ये बजा तुम ने कहा शिकवा-ए-बेजा न करो

मैं कोई ग़ैर की हसरत नहीं अरमान नहीं
अपनी महफ़िल से मुझे यार निकाला न करो

उन की पैमाँ-शिकनी उन को ये सिखलाती है
कर के उश्शाक़ से वा'दा कभी ईफ़ा न करो

उन का ग़ुस्सा नहीं कुछ क़हर-ए-ख़ुदा हज़रत-ए-दिल
बुत बिगड़ते हैं तो हरगिज़ कोई पर्वा न करो

ग़ैर से क़त-ए-तअल्लुक़ में भलाई है ज़रूर
हाँ अगर कोई बुराई हो तो अच्छा न करो

ख़ाकसारी का सिखाता है तरीक़ा मुझे ज़ोफ़
कहता है बैठ के इस बज़्म से उठा न करो

जान से अपनी गुज़र जाओ मोहब्बत में 'फहीम'
नाम अगर चाहते हो हिम्मत-ए-मर्दाना करो

— Faheem Gorakhpuri

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