उठ अज़-सर-ए-नौ दहर के हालात बदल डाल

तदबीर से तक़दीर के दिन-रात बदल डाल
फिर दरस-ए-मुसावात की हाजत है जहाँ को
आक़ाई-ओ-ख़िदमत के ख़िताबात बदल डाल
काला हो कि गोरा हो ख़ुदा एक है सब का
क़ौमिय्यत-ए-बेजा की रिवायात बदल डाल
चीनी हो कि हिन्दी हो बराबर के हैं भाई
वतनिय्यत-ए-महदूद के वहमात बदल डाल
कुल छोटे-बड़े आदम-ए-ख़ाकी के हैं फ़रज़ंद
हर नस्ल से बेज़ार हो हर ज़ात बदल डाल
अख़्लाक़ में ताक़त है फ़ुज़ूँ तेग़-ओ-सिनाँ से
पैकार के ये आहनी आलात बदल डाल
क्या ज़ुल्म है इंसान हो इंसान का दुश्मन
मरदान-ए-हवस-कार की आदात बदल डाल
मेहनत से भी मज़दूर को रोटी नहीं मिलती
इस बंदा-ए-मजबूर के औक़ात बदल डाल
आपस में ये हर रोज़ की ख़ूँ-रेज़ियाँ कब तक
ख़ुद-साख़्ता मज़हब की रूसूमात बदल डाल
हुर्रियत-ए-कामिल का वो ए'जाज़ दिखा तू
दुनिया-ए-ग़ुलामी के तिलिस्मात बदल डाल
ख़िल्क़त को बुला शिर्क से तौहीद की जानिब
पीरों की फ़क़ीरों की करामात बदल डाल
ता'लीम पे मौक़ूफ़ है रानाई-ए-अफ़कार
बेहूदा किताबों की ख़ुराफ़ात बदल डाल
कर फ़िक्र-ए-अमल ज़िक्र-ए-ख़त-ओ-ख़ाल अबस है
ऐ 'फ़ैज़' ज़रा अपने ख़यालात बदल डाल

— Faiz Ludhianvi

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Muflisi Shayari

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