तेरे वास्ते गिड़गिड़ाते रहे
ख़ुदा की क़सम जाॅं लुटाते रहे
कभी बद-गुमानी कभी रंज-ओ-ग़म
हमें सब यहाॅं आज़माते रहे
वफ़ादार भी हम हमीं बे-वफ़ा
सितम है ये कैसा जो ढाते रहे
अगर तुम नहीं तो कोई भी नहीं
ज़माने से हम क्या बताते रहे
तुम्हें क्या ख़बर हम वफ़ादार थे
हमें तुम फ़क़त आज़माते रहे
— Hameed Sarwar Bahraichi















