सारा ग़म आँखों से बह जाता है
तू फिर भी आँखों में रह जाता है
इन आँखों में अब कैसी हलचल है
ये बातें तो मुझ से कह जाता है
कुछ दिन की हस्ती इस
में इतने ग़म
नस्ल-ए-आदम क्या कुछ सह जाता है
मुझ को देखोगे तो ये जानोगे
कैसे ख़्वाबों का घर ढह जाता है
— Hrishita Singh















