वो नहीं मिलता मुझे इस का गिला अपनी जगह

उस के मेरे दरमियाँ का फ़ासला अपनी जगह

ज़िंदगी के इस सफ़र में सैकड़ों चेहरे मिले
दिलकशी उन की अलग पैकर तिरा अपनी जगह

तुझ से मिल कर आने वाले कल से नफ़रत मोल ली
अब कभी तुझ से न बिछड़ूँ ये दुआ अपनी जगह

इक मुसलसल दौड़ में हैं मंज़िलें और फ़ासले
पेड़ तो अपनी जगह हैं रास्ता अपनी जगह

— Iftikhar Imam Siddiqi

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