किसने समझा है औरतों का दुख
रेज़ा रेज़ा है औरतों का दुख
मर्द का दुख बड़ा या औरत का
मुझको लगता है औरतों का दुख
दाद-ए-यज़्दानी मिलती है उसको
जो समझता है औरतों का दुख
चीरती पेट नस्ल-दर-नस्लें
समझो कितना है औरतों का दुख
तज़्किरा भी न कर सके औरत
कौन सुनता है औरतों का दुख
जन्म से लेके ख़ाक होने तक
बढ़ता रहता है औरतों का दुख
हो के हैरान एक दूजे के
चेहरे तकता है औरतों का दुख
या ख़ुदा कुछ तो राहतें हो अता
कम न होता है औरतों का दुख
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by 'June' Sahab Barelvi
our suggestion based on 'June' Sahab Barelvi
As you were reading Udas Shayari Shayari