इश्क़ के सिलसिलों में गुज़री है
दिल-लगी हादसों में गुज़री है
कह रही सिलवटें ये बिस्तर की
रात तो करवटों में गुज़री है
रोना फिर कितनी मुश्किलों का है
उम्र जब क़हक़हों में गुज़री है
अब अकेला रहूँगा मैं कैसे
ज़िंदगी दोस्तों में गुज़री है
— Manas Ank
दिल-लगी हादसों में गुज़री है
कह रही सिलवटें ये बिस्तर की
रात तो करवटों में गुज़री है
रोना फिर कितनी मुश्किलों का है
उम्र जब क़हक़हों में गुज़री है
अब अकेला रहूँगा मैं कैसे
ज़िंदगी दोस्तों में गुज़री है
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