सीखा है हम ने ये हुनर धीरे-धीरे

कटता कैसे यार सफ़र धीरे-धीरे

कोई आया है मिलने उस-पार हमें
सो हम है बेचैन इधर धीरे-धीरे
इश्क़ सही से करना गर कोई सीखे
तो होता है इस का असर धीरे-धीरे

तुम को मुझ से कोई और चुरा लेगा
गर आओगे तुम जो अगर धीरे-धीरे

झुक जाती हैं मेरी पलकें तब ख़ुद ही
जब उठती है उन की नज़र धीरे-धीरे

कोई दिल से उतरे तो दुख होता है
धड़कन मैं मेरी तू उतर धीरे-धीरे

मुझ को पाला एसे मम्मी पापा ने
बढ़ता है जैसे कि शजर धीरे-धीरे

दूर बुलंदी पर जाना तय है मेरा
जाऊँगा दोस्त में मगर धीरे-धीरे

— Manish watan

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