गर तलब बे-लगाम होती नहीं
ज़िंदगी ज़ेर-ए-दाम होती नहीं
सब्र और शुक्र है सिफ़त जिन की
उन की नींदें हराम होती नहीं
इश्क़ की आरज़ू न करते अगर
ज़िंदगी यूँ तमाम होती नहीं
हिज्र में ही गुज़र रहे हैं दिन
वस्ल की कोई शाम होती नहीं
दी जिन्होंने भी जान हक़ के लिए
उन की नस्लें ग़ुलाम होती नहीं
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














