shaikh jee aao musalla giro jaam karo | शैख़ जी आओ मुसल्ला गिरो जाम करो

  - Meer Taqi Meer

शैख़ जी आओ मुसल्ला गिरो जाम करो
जिंस तक़्वा के तईं सिर्फ़ मय-ए-ख़ाम करो

फ़र्श मस्ताँ करो सज्जादा-ए-बे-तह के तईं
मय की ताज़ीम करो शीशे का इकराम करो

दामन-ए-पाक को आलूदा रखो बादे से
आप को मुग़्बचों के क़ाबिल-ए-दुश्नाम करो

नेक-नामी-ओ-तक़ावत को दुआ जल्द कहो
दीन-ओ-दिल पेश-कश सादा-ए-ख़ुद-काम करो

नंग-ओ-नामूस से अब गुज़रो जवानों की तरह
पर फ़िशानी करो और साक़ी से इबराम करो

ख़ूब अगर जुरआ' मय-नोश नहीं कर सकते
ख़ातिर-जमअ' मय-आशाम से ये काम करो

उठ खड़े हो जो झुके गर्दन-ए-मीना-ए-शराब
ख़िदमत-ए-बादा-गुसाराँ ही सर-अंजाम करो

मुतरिब आ कर जो करे चंग-नवाज़ी तो तुम
पैरहन मस्तों की तक़लीदस इनआ'म करो

ख़ुनकी इतनी भी तो लाज़िम नहीं इस मौसम में
पास जोश-ए-गुल-ओ-दिल गर्मी-ए-अय्याम करो

साया-ए-गुल में लब-ए-जू पे गुलाबी रखो
हाथ में जाम को लो आप को बदनाम करो

आह-ए-ता-चंद रहो ख़ानकाह-ओ-मस्जिद में
एक तो सुब्ह-ए-गुलसिताँ में भी शाम करो

रात तो सारी गई सुनते परेशाँ-गोई
'मीर'-जी कोई घड़ी तुम भी तो आराम करो

  - Meer Taqi Meer

Mausam Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Meer Taqi Meer

As you were reading Shayari by Meer Taqi Meer

Similar Writers

our suggestion based on Meer Taqi Meer

Similar Moods

As you were reading Mausam Shayari Shayari