taqat nahin hai dil main ne jee baja raha hai | ताक़त नहीं है दिल मैं ने जी बजा रहा है

  - Meer Taqi Meer

ताक़त नहीं है दिल मैं ने जी बजा रहा है
क्या नाज़ कर रहे हो अब हम में क्या रहा है

जेब और आस्तीं से रोने का काम गुज़रा
सारा निचोड़ अब तो दामन पर आ रहा है

अब चैत गर नहीं कुछ ताज़ा हुआ हूँ बेकल
आया हूँ जब ब-ख़ुद में जी इस में जा रहा है

काहे का पास अब तो रुस्वाई दूर पहुँची
राज़-ए-मोहब्बत अपना किस से छपा रहा है

गर्द-ए-रह उस की यारब किस और से उठेगी
सौ सौ ग़ज़ाल हर-सू आँखें लगा रहा है

बंदे तो तरहदार व्हीं तरह कश तुम्हारे
फिर चाहते हो क्या तुम अब इक ख़ुदा रहा है

देख उस दहन को हर-दम ऐ आरसी कि यूँँ ही
ख़ूबी का दर कसो के मुँह पर भी वा रहा है

वे लुत्फ़ की निगाहें पहले फ़रेब हैं सब
किस से वो बे-मुरव्वत फिर आश्ना रहा है

इतना ख़िज़ाँ करे है कब ज़र्द रंग पर याँ
तू भी कसो निगह से ऐ गुल जुदा रहा है

रहते हैं दाग़ अक्सर नान-ओ-नमक की ख़ातिर
जीने का उस समयँ में अब क्या मज़ा रहा है

अब चाहता नहीं है बोसा जो तेरे लब से
जीने से 'मीर' शायद कुछ दिल उठा रहा है

  - Meer Taqi Meer

Nazar Shayari

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