mehram nahin hai tu hi navaa-ha-e-raaz ka | महरम नहीं है तू ही नवा-हा-ए-राज़ का

  - Mirza Ghalib

महरम नहीं है तू ही नवा-हा-ए-राज़ का
याँ वर्ना जो हिजाब है पर्दा है साज़ का

रंग-ए-शिकस्ता सुब्ह-ए-बहार-ए-नज़ारा है
ये वक़्त है शगुफ़्तन-ए-गुल-हा-ए-नाज़ का

तू और सू-ए-ग़ैर नज़र-हा-ए-तेज़ तेज़
मैं और दुख तिरी मिज़ा-हा-ए-दराज़ का

सर्फ़ा है ज़ब्त-ए-आह में मेरा वगर्ना में
तोमा हूँ एक ही नफ़स-ए-जाँ-गुदाज़ का

हैं बस-कि जोश-ए-बादा से शीशे उछल रहे
हर गोशा-ए-बिसात है सर शीशा-बाज़ का

काविश का दिल करे है तक़ाज़ा कि है हुनूज़
नाख़ुन पे क़र्ज़ इस गिरह-ए-नीम-बाज़ का

ताराज-ए-काविश-ए-ग़म-ए-हिज्राँ हुआ 'असद'
सीना कि था दफ़ीना गुहर-हा-ए-राज़ का

  - Mirza Ghalib

Sad Shayari

Our suggestion based on your choice

    ख़ून से जोड़ा हुआ हर ईंट ढेला हो गया
    दो तरफ़ चूल्हे जले औ' घर अकेला हो गया
    Dhiraj Singh 'Tahammul'
    दुख तो बहुत मिले हैं मोहब्बत नहीं मिली
    यानी कि जिस्म मिल गया औरत नहीं मिली

    मुझको पिता की आँख के आँसू तो मिल गए
    मुझको पिता से ज़ब्त की आदत नहीं मिली
    Read Full
    Abhishar Geeta Shukla
    51 Likes
    वो रातें चाँद के साथ गईं वो बातें चाँद के साथ गईं
    अब सुख के सपने क्या देखें जब दुख का सूरज सर पर हो
    Ibn E Insha
    20 Likes
    दूजों का दुःख समझने को बे हद ज़रूरी है
    थोड़ी सही प दिल में अज़ीयत बनी रहे
    Afzal Ali Afzal
    36 Likes
    जो सावन होते सूखा, उस फूल पे लानत हो
    मुझ पे लानत, तेरे होते, यार उदासी है
    Siddharth Saaz
    27 Likes
    पहले ये काम बड़े प्यार से माँ करती थी
    अब हमें धूप जगाती है तो दुख होता है
    Munawwar Rana
    49 Likes
    सुखा ली सबने ही आँखे हवा ए ज़िन्दगी से
    यहां अब भी वही रोना रुलाना चल रहा है
    Farhat Ehsaas
    33 Likes
    लम्हे उदास उदास फ़ज़ाएं घुटी घुटी
    दुनिया अगर यही है तो दुनिया से बच के चल
    Shakeel Badayuni
    22 Likes
    पत्थर दिल के आँसू ऐसे बहते हैं
    जैसे इक पर्वत से नदी निकलती है
    Shobhit Dixit
    11 Likes
    शहर का तब्दील होना शाद रहना और उदास
    रौनक़ें जितनी यहाँ हैं औरतों के दम से हैं
    Muneer Niyazi
    23 Likes

More by Mirza Ghalib

As you were reading Shayari by Mirza Ghalib

    लताफ़त बे-कसाफ़त जल्वा पैदा कर नहीं सकती
    चमन ज़ंगार है आईना-ए-बाद-ए-बहारी का

    हरीफ़-ए-जोशिश-ए-दरिया नहीं खुद्दारी-ए-साहिल
    जहाँ साक़ी हो तू बातिल है दा'वा होशियारी का

    बहार-ए-रंग-ए-ख़ून-ए-गुल है सामाँ अश्क-बारी का
    जुनून-ए-बर्क़ नश्तर है रग-ए-अब्र-ए-बहारी का

    बरा-ए-हल्ल-ए-मुश्किल हूँ ज़ि-पा उफ़्तादा-ए-हसरत
    बँधा है उक़्दा-ए-ख़ातिर से पैमाँ ख़ाकसारी का

    ब-वक़्त-ए-सर-निगूनी है तसव्वुर इंतिज़ारिस्ताँ
    निगह को आबलों से शग़्ल है अख़्तर-शुमारी का

    'असद' साग़र-कश-ए-तस्लीम हो गर्दिश से गर्दूं की
    कि नंग-ए-फ़हम-ए-मस्ताँ है गिला बद-रोज़गारी का
    Read Full
    Mirza Ghalib
    बेदाद-ए-इश्क़ से नहीं डरता मगर 'असद'
    जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा
    Mirza Ghalib
    लाज़िम था कि देखो मिरा रस्ता कोई दिन और
    तन्हा गए क्यूँ अब रहो तन्हा कोई दिन और

    मिट जाएगा सर गर तिरा पत्थर न घिसेगा
    हूँ दर पे तिरे नासिया-फ़रसा कोई दिन और

    आए हो कल और आज ही कहते हो कि जाऊँ
    माना कि हमेशा नहीं अच्छा कोई दिन और

    जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे
    क्या ख़ूब क़यामत का है गोया कोई दिन और

    हाँ ऐ फ़लक-ए-पीर जवाँ था अभी आरिफ़
    क्या तेरा बिगड़ता जो न मरता कोई दिन और

    तुम माह-ए-शब-ए-चार-दहुम थे मिरे घर के
    फिर क्यूँ न रहा घर का वो नक़्शा कोई दिन और

    तुम कौन से थे ऐसे खरे दाद-ओ-सितद के
    करता मलक-उल-मौत तक़ाज़ा कोई दिन और

    मुझ से तुम्हें नफ़रत सही नय्यर से लड़ाई
    बच्चों का भी देखा न तमाशा कोई दिन और

    गुज़री न ब-हर-हाल ये मुद्दत ख़ुश ओ ना-ख़ुश
    करना था जवाँ-मर्ग गुज़ारा कोई दिन और

    नादाँ हो जो कहते हो कि क्यूँ जीते हैं 'ग़ालिब'
    क़िस्मत में है मरने की तमन्ना कोई दिन और
    Read Full
    Mirza Ghalib
    सफ़ा-ए-हैरत-ए-आईना है सामान-ए-ज़ंग आख़िर
    तग़य्युर आब-ए-बर-जा-मांदा का पाता है रंग आख़िर

    न की सामान-ए-ऐश-ओ-जाह ने तदबीर वहशत की
    हुआ जाम-ए-ज़मुर्रद भी मुझे दाग़-ए-पलंग आख़िर

    ख़त-ए-नौ-ख़ेज़ नील-ए-चश्म ज़ख़्म-ए-साफ़ी-ए-आरिज़
    लिया आईना ने हिर्ज़-ए-पर-ए-तूती ब-चंग आख़िर

    हिलाल-आसा तही रह गर कुशादन-हा-ए-दिल चाहे
    हुआ मह कसरत-ए-सरमाया-अंदाेज़ी से तंग आख़िर

    तड़प कर मर गया वो सैद-ए-बाल-अफ़्शाँ कि मुज़्तर था
    हुआ नासूर-ए-चश्म-ए-ताज़ियत चश्म-ए-ख़दंग आख़िर

    लिखी यारों की बद-मस्ती ने मयख़ाने की पामाली
    हुइ क़तरा-फ़िशानी-हा-ए-मय-बारान-ए-संग आख़िर

    'असद' पर्दे में भी आहंग-ए-शौक़-ए-यार क़ाएम है
    नहीं है नग़्मे से ख़ाली ख़मीदन-हा-ए-चंग आख़िर
    Read Full
    Mirza Ghalib
    हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है
    वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता
    Mirza Ghalib
    148 Likes

Similar Writers

our suggestion based on Mirza Ghalib

Similar Moods

As you were reading Sad Shayari Shayari