तरस मुझ पे ख़ुदारा खा कभी तो

मेरा हिस्सा मुझे लौटा कभी तो

तुराब अपनी कहानी ख़ुद कहेगी
सुलगती रेत को सहला कभी तो

ख़ुशी तू सब के हिस्से आ चुकी है
मेरी भी दस्तरस में आ कभी तो

सहम जाता हूँ तेरे डाँटने पर
तू मुझ को प्यार से समझा कभी तो

हमेशा हाँ में हाँ भरता है ‘मौजी’
शिकायत भी लबों पर ला कभी तो

— Manmauji

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