वो मुझे दस्तियाब था ही नहीं
अब कोई और इल्तिजा ही नहीं
सुब्ह से मुँह फुलाए बैठा हूँ
किस से नाराज़ हूँ पता ही नहीं
हुज्जतें रब्त को कुचल देतीं
मैं किसी बात पे अड़ा ही नहीं
मेरे जैसे हज़ार देखे हैं
तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं
तेरी ख़ुश्बू को मात दे पाए
फूल वो शाख़ पर खिला ही नहीं
वो मेरी आख़िरी मुहब्बत है
उस को इस बात का पता ही नहीं
— Manmauji















