उभरती डूबती साँसों का सिलसिला क्यूँँ है
कभी ये सोच कि जो कुछ हुआ हुआ क्यूँँ है
बने हैं एक ही मिट्टी से हम सभी लेकिन
हमारी सोच में इस दर्जा फ़ासला क्यूँँ है
लगा रखा है ये किस ने कड़ी को अंदर से
उजाड़ घर का दरीचा डरा डरा क्यूँँ है
अभी तो फूल भी आए नहीं हैं शाख़ों पर
अभी से बोझ दरख़्तों पे पड़ रहा क्यूँँ है
ठहर गया है वो आ कर अना के नुक़्ते पर
उसी के साथ मिरा वक़्त रुक गया क्यूँँ है
तुम्हीं ने सोच के बिच्छू लगा के रक्खे थे
नहीं तो ज़ख़्म तुम्हारा हरा-भरा क्यूँँ है
समझ रहा है कि तेरी कोई सुनेगा नहीं
तू अपने जिस्म की चीख़ों से बोलता क्यूँँ है
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