कुल समाअ'त दुखी सदा को दूँ
जिस्म धरती को जाँ हवा को दूँ
अपनी सारी मताअ'-ए-अक़्ल-ओ-ख़िरद
रूठने की तिरी अदा को दूँ
कुल अनासिर अलग-अलग कर के
कुछ तुझे और कुछ ख़ुदा को दूँ
इक धनक है मिरी निगाहों में
तेरी ज़ुल्फ़ों को या घटा को दूँ
देखूँ कितना लहू टपकता है
अब के ख़ंजर कफ़-ए-वफ़ा को दूँ
— Om Prabhakar















