जहाँ ज़मीं से जुड़ा आसमान दिखता है

उसी जगह मुझे अपना मकान दिखता है

पनाह-ए-दश्त में आया दबीज़ शहर से मैं
यहाँ भी जाल शिकारी मचान दिखता है

सफ़र में आया मिरे एक शहर ऐसा भी
जहाँ पे दूर से अम्न-ओ-अमान दिखता है

नज़र हमारी अगर हो ज़रा फ़क़ीराना
बहुत सलीस ये सारा जहान दिखता है

सँभल के देख कि ऐ पीर मेरी हस्ती में
तुझे कहीं भी ख़ुदा का निशान दिखता है

— Om Prabhakar

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