दर-ओ-दीवार पे हिजरत के निशाँ देख आएँ

आओ हम अपने बुज़ुर्गों के मकाँ देख आएँ

आओ भीगी हुई आँखों से पढ़ें नौहा-ए-दिल
आओ बिखरे हुए रिश्तों का ज़ियाँ देख आएँ

टूटा टूटा हुआ दिल ले के फिरें गलियों में
कच्ची मिट्टी के खिलौनों की दुकाँ देख आएँ

रौशनी के कहीं आसार तो बाक़ी होंगे
आओ पिघली हुई शम्ओं का धुआँ देख आएँ

जिन दरख़्तों के तले रक़्स-ए-सबा होता था
सूखे पत्तों का बरसना भी वहाँ देख आएँ

अब फ़रिश्तों के सिवा कोई न आता होगा
कौन देता है ख़राबों में अज़ाँ देख आएँ

मुद्दतों ब'अद मुहाजिर की तरह आए हैं
रूठ जाए न खंडर आओ मियाँ देख आएँ

— Qaisar-ul-Jafri

More by Qaisar-ul-Jafri

Other ghazal from the same pen

See all from Qaisar-ul-Jafri →

Rishta Shayari Collection

Shers of rishta shayari collection.

All Rishta Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling