वो सितम-गर है ख़यालात समझने वाला

मुझ से पहले मिरे जज़्बात समझने वाला

मैं ने रक्खा है हमेशा ही तबस्सुम लब पर
रो दिया क्यूँ मिरे हालात समझने वाला

जो न समझे तेरी मंज़िल वो यूँही चलता रहा
रुक गया तेरे मक़ामात समझने वाला

जो न समझे वो बनाते रहे लाखों बातें
हुआ ख़ामोश तिरी बात समझने वाला

राज़-ए-तक़्दीर पे क्या रौशनी डालेगा कोई
ख़ुद सवाली है सवालात समझने वाला

— Qamar Jalalabadi

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