mujhe udne ki aadat ho gai hai | मुझे उड़ने की आदत हो गई है

  - Rachit Sonkar

मुझे उड़ने की आदत हो गई है
परिंदो से मुहब्बत हो गई है

खड़ी रहती हैं मूरत की तरह ये
उदासी भी इमारत हो गई है

कफ़न में लिपटी हैं साँसें हमारी
बहुत नाज़ुक तबीअत हो गई है

बहारों में तुम्हें देखा है जब से
मुझे रंगों से रग़बत हो गई है

अँगूठी देनी है मुझको किसी को
मगर पैसों की क़िल्लत हो गई है

तेरी यादों से लड़ता हूँ मुसलसल
मेरी ख़ुद से बग़ावत हो गई है

यही अंजाम होना था हमारा
रचित मरने की सूरत हो गई है

  - Rachit Sonkar

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