चल आज दिल फिर इश्क़ की उस बेख़ुदी को याद कर
वो बेबसी वो बेकली उस दिलकशी को याद कर
उन झील सी आँखों में अपनी शाम का वो डूबना
साहिल पे जो प्यासी रही उस तिश्नगी को याद कर
मुड़-मुड़ के वो तकना तिरा चुपके से फिर वो झाँकना
उल्फ़त की पहली वो हया उस सादगी को याद कर
खिलना तिरा उस धूप में इक सुर्ख़-ओ-ताज़ा फूल सा
चेहरे पे जो बिखरी रही उस ताज़गी को याद कर
माना कि अब तू चाँद है हर सम्त फैला नूर है
जिस में हुआ सूरज फ़ना उस तीरगी को याद कर
रुतबा मिला शोहरत मिली पीछे ज़माना चल पड़ा
दामन से जो लिपटी रही उस मुफ़लिसी को याद कर
पहचान जिस की खो गई दुनिया की इस रफ़्तार में
ऐ दिल ज़रा तू लौट कर अब 'सारथी' को याद कर















