ख़याल कम भी नहीं हो रहा तअज्जुब है
जमाल कम भी नहीं हो रहा तअज्जुब है
रहा वो सामने पर गुफ़्तगू न हो पाई
मलाल कम भी नहीं हो रहा तअज्जुब है
तमाम उम्र ही गुज़री है इम्तिहानों में
सवाल कम भी नहीं हो रहा तअज्जुब है
ढली है धूप मगर हाथ की लकीरों का
उबाल कम भी नहीं हो रहा तअज्जुब है
बुझा दिए हैं हवाओं ने सब चराग़ मगर
जलाल कम भी नहीं हो रहा तअज्जुब है
— Saarthi Baidyanath















