ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है

हद-ए-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है

हर एक जिस्म रूह के अज़ाब से निढाल है
हर एक आँख शबनमी हर एक दिल फ़िगार है

हमें तो अपने दिल की धड़कनों पे भी यक़ीं नहीं
ख़ुशा वो लोग जिन को दूसरों पे ए'तिबार है

न जिस का नाम है कोई न जिस की शक्ल है कोई
इक ऐसी शय का क्यूँ हमें अज़ल से इंतिज़ार है

ये किस मक़ाम पे हयात मुझ को ले के आ गई
न बस ख़ुशी पे है जहाँ न ग़म पे इख़्तियार है

तमाम उम्र का हिसाब माँगती है ज़िंदगी
ये मेरा दिल कहे तो क्या कि ख़ुद से शर्मसार है

बुला रहा है कौन मुझ को चिलमनों के उस तरफ़
मेरे लिए भी क्या कोई उदास बे-क़रार है

— Shahryar

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