रात ख़ुदस झगड़ते रहे तन्हा हम
मोम जैसे पिघलते रहे तन्हा हम
लौट आते जो आवाज़ दे देते तुम
बे-सबब यार चलते रहे तन्हा हम
बात थी ग़म ख़ुशी साथ बांटेंगे सब
आँख में पानी भरते रहे तन्हा हम
क्या सही है ग़लत क्या है ये जानने
उम्र भर ख़ुदस लड़ते रहे तन्हा हम
जो गए हम अमीरों की बस्ती में कल
और क्या करते बैठे रहे तन्हा हम
— Shubham Mishra















