लकीरों में मेरी सलामत हैं कुछ लोग
यक़ीनन ख़ुदा की इनायत हैं कुछ लोग
जभी दिन ढला, रौशनी बन गए वो
मिले ज़िन्दगी में मुहब्बत हैं कुछ लोग
बड़ी यार आसाँ थी दुनिया हमारी
मिले फिर हमें भी मुसीबत हैं कुछ लोग
समझ से परे हैं यक़ीनन मिरी वो
न जाने कहाँ की सियासत हैं कुछ लोग
नहीं मिल रहे दिल, निभाना है फिर भी
अजी ख़ानदानी विरासत हैं कुछ लोग
सुख़न को समा'अत की जिस तरह से है
उसी तर्ह मेरी ज़रूरत हैं कुछ लोग
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