दे नहीं सकता फ़ाइदा मुझ को
यार लगता है बे-वफ़ा मुझ को
रस्सी पंखा है मेज टेबल है
अपनी जानिब को खींचता मुझ को
होंठों को तेरे चूम लूँगा मैं
आँख भर के न देखना मुझ को
याद में उस की रातें कटती हैं
हिज्र दीमक सा चाटता मुझ को
लड़का तो मैं भी भोला भाला था
हो गया है ये क्या से क्या मुझ को
आप क्यूँ बार बार आते हैं
आने भी दीजिए हवा मुझ को
नील तक तो मुझे दे पाया नहीं
ख़ाक देगा तू रास्ता मुझ को
मीर ग़ालिब ही करता रहता है
चल अली की ग़ज़ल सुना मुझ को
दुनिया लेती हैं मशवरा मुझ से
आप देते हैं मशवरा मुझ को
— Sohaib Alvi















