ये दवा आज आज़माने दे
जाम ला उस की याद आने दे
अंजुमन में तिरी सभी दाना
इक मुझे भी ग़ज़ल सुनाने दे
काम उस का चलो करें आसाँ
जा रहा है ख़ुशी से जाने दे
बात बुत से ग़ज़ल नहीं होती
क़ाफ़िया भी ज़रा मिलाने दे
होश वाले अलग नशे में हैं
दोस्त मय पीने दे पिलाने दे
दिन है मसरूफ़ और शब तन्हा
शाम तो ख़ुशनुमा बनाने दे
रोज़ की बात है ग़म-ए-दुनिया
छोड़ भी गीत गुनगुनाने दे
— Surendra Karkash















