ठग रहा अत्तार बन कर क्यूँ वो सारे शहर को
नाम दे कर इत्र का वो बेचता है ज़हर को
तोड़ नाज़ुक फूल वो लाता है हर दिन बाग़ से
फिर मसलता है उन्हें वो सुब्ह शब दोपहर को
देख कर ये सब न जाने सो रहा है क्यूँ ख़ुदा
ज़लज़ला ले आ अभी या रोक तो इस क़हर को
लिख रहे हैं हम सभी अश'आर जो यूँ बैठ कर
क्या कभी अश'आर ये बदलेंगे भी इस दहर को
— Dr Bhagyashree Joshi















