रौशनी जो नहीं चाँदनी रात में
मुझ से होगी नहीं शा'इरी रात में
बल्ब की रौशनी है मगर ढूँढ़ना
जुगनुओं की मुझे ज़िंदगी रात में
इश्क़ में रातों-दिन हैं इबादत के पर
मुझ से होती नहीं बंदगी रात में
इतना रोया है वो हिज्र की रात को
उस से होती नहीं दिल-लगी रात में
— Abhishek Baba















