अभी भी सोचना कैसा के हाल क्या होगा
ज़वाल हो तो चुका अब ज़वाल क्या होगा
तेरे ख़याल में ख़ुद को भुला चुका हूँ मैं
न जाने आलम-ए-शाम-ए-विसाल क्या होगा
तमाम 'उम्र इसी सोच में बसर की है
के तू न लौट के आया तो हाल क्या होगा
तुझे भी दहर के ग़म में मिला लिया मैंने
अब इसके बाद भी दिल को मलाल क्या होगा
तेरी नज़र की ख़ुमारी में खो गई दुनिया
अगर तू पर्दा हटा दे तो हाल क्या होगा
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