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जिस्म थक कर गिर गया लड़ती रही है ज़िंदगी - Haider Khan

जिस्म थक कर गिर गया लड़ती रही है ज़िंदगी
राह में काँटे मिले फिर भी चली है ज़िदंगी

हर बुरे हालात में मुर्झा के फूलों सी गिरी
और अश्कों के सहारे फिर खिली है ज़िंदगी

ग़म की बारिश में जो भीगे तो फ़ना हो जाएंगे
ये गुमाँ होता है जैसे कागज़ी है ज़िंदगी

दिन बड़े आराम से कटते रहे हैं उम्र भर
रात सन्नाटों में जैसे चीखती है ज़िंदगी

Haider Khan
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