इक दफ़ा उसका मुझे लहजा ज़रा ग़ैर लगा
फिर तो हर शख़्स ही जो मुझ को मिला, ग़ैर लगा
था सितम ये कि शब-ए-ग़म में तिरे होते हुए
जब मैं टूटा तो मिरे सीने से आ ग़ैर लगा
मैं ख़फ़ा हो के तिरे दर से चला आया मगर
फिर कोई दर जो कभी मुझ पे खुला, ग़ैर लगा
अपने चेहरे से तुझे जब भी हटाया मैं ने
आइने को भी मिरा चेहरा बड़ा ग़ैर लगा
ज़िन्दगी मैं ने यूँँ आसान बना रक्खी है
जो मिला अपना लगा, और जो गया ग़ैर लगा
इस क़दर उस के तग़ाफ़ुल की है आदत मुझ को
अब के जब उस ने मुझे अपना कहा, ग़ैर लगा
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