तुम्हारी आँखों में जितने हसीन ख़्वाब मिले
हक़ीक़तों को टटोला तो सब अज़ाब मिले
तुम्हारी ईदी में अब भी कमी है थोड़ी सी
गले मिलो तो ये बिगड़ा हुआ हिसाब मिले
जिसे नसीब न हो एक वक़्त की रोटी
उसे गुनाह भी करने पे कुछ सवाब मिले
हमारे आबा-ओ-अज्दाद से विरासत में
ज़मीं नहीं न सही पर हमें किताब मिले
हुआ ही क्या जो मुझे राख कर दिया उस ने
मैं चाहता भी यही था कि आफ़्ताब मिले
— Haider Khan















