ये ज़िंदगी भी अज़ब से मुक़ाम लाती है
भुला दिया था जिसे उस की याद आती है
वो सज सँवर के अगर यूँ कभी भी जाती है
बहारों को वो यक़ीनन बड़ा जलाती है
वो रो गई है सितम देख कर ज़माने के
वो आग को भी तो यूँ आग से बुझाती है
खड़ा हूँ देख रहा हूँ उसी हसीं को अभी
जो आँखों आँखों से दिल में उतरती जाती है
— Toyesh prakash















