भरा पड़ा है जमाना उन सेे ख़ुदा जो ख़ुद को बता रहे हैं

वहीं यहाँ पे कुछ एक बुत हैं जो ख़ुद को इंसां बना रहे हैं

हजार आँखों में ख़्वाब जिन के सजे हुए हैं वो एक साहब
न जाने क्यूँ बस हमारी आँखों से ख़ुद को यकसर बचा रहे हैं

ख़याल जब भी कभी हमारे लगा कि कपड़े उतार देंगे
तो साथ आए कुछ एक ग़म जो हमारे दिल की रिदा रहे हैं

हमारे हिस्से में आई इक शब उसी को ओढ़ें वही बिछाएं
गुजारें कब तक यूँ मुफ़लिसी में सो उम्र अपनी घटा रहे हैं

कहीं किसी पर अ
गर खुला तो वो शे'र बिल्कुल नहीं हमारा
हमें पता है कई मुनाफ़िक़ हमारी ग़ज़लों में आ रहे हैं

हम इस्तिख़ारा महज़ दिखावे को रख के बैठे हैं पहली सफ़ में
इसी मुखौटे की आड़ में हम हवस कि फ़स्लें उगा रहे हैं

— Rahul Singh Parihar

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