ज़िन्दगी, क्या कहा, सुधर जाएँ
ज़ात से अपनी हम उतर जाएँ
कोई रख कर हमें यूँँ छोड़ गया
पहले धक्के में ही बिखर जाएँ
एक भी आँख भर नहीं पाते
किस से ये सीखने हुनर जाएँ
एक वा'दा तो हम से ले लो तुम
कुछ तो हो जिस सेे हम मुक़र जाएँ
तुम पे जो इख़्तियार पा लें तो
ऐन-मुमकिन ख़ुशी से मर जाएँ
चाहते थे, कि कुछ तो कह दो तुम
हम जिसे मानकर ठहर जाएँ
आरज़ू ख़त्म ज़िस्म की कर दी
इश्क़ पूछे है हम किधर जाएँ?
आख़िरी काम तक ख़राब किया
जल्दबाज़ी में इस कि घर जाएँ
हम किसी काम के बचे ही नहीं
कुछ बचा ही नहीं जो कर जाएँ
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