अपनों में ढूँढ़ न ही अब के नज़ारे में ढूँढ़
ढूँढ़ना है तो मुझे अब तू ख़सारे में ढूँढ़
जब तलक था तो नहीं जान सका मेरी क़द्र
अब कहीं बैठ के रातों को सितारे में ढूँढ़
नाज़ था जिस पे तुझे उस ने ही बख़्शे हैं ये ज़ख़्म
तू भी बेचैन हो और मुझ को सहारे में ढूँढ़
कोई फिर उस से जुड़ी याद बचा ले तुझ को
आज उस लड़के को बे-सब्र पिटारे में ढूँढ़
तुझ को ले डूबा है तेरी ही ज़ेहानत का बोझ
हो सके तुझ से तो और ऐब सहारे में ढूँढ़
जब किनारे से मिला तो खुला दिल पे इक राज़
कह रहा था कि सुकूँ को तू किनारे में ढूँढ़
कोई मुझ को भी अगर ढूँढ़ता दिख जाए 'हरेश'
उसे कहना कि उसे वक़्त के मारे में ढूँढ़















