ख़ुदस ख़ुद की अनबन हूँ मैं
इक सुलझी सी उलझन हूँ मैं
जिस ने देखा नज़रें फेरी
जाने कितना रौशन हूँ मैं
मुझ को पाना क़िस्मत समझो
इक शबरी की जूठन हूँ मैं
वो पहने या फेंके मुझ को
शहज़ादी का कंगन हूँ मैं
नजदीकी दुःखदायी होगी
क्रोधित शिव का नर्तन हूँ मैं
— Vikas Sahaj















