shaam mein ghaar tha | शाम में ग़ार था

  - Waheed Ahmad

शाम में ग़ार था
ग़ार में रात थी
रात के नम अंधेरे में इक अजनबियत का एहसास था
चलती साँसों की हिलती हुई सतह पर
वक़्त की नाव ठहरी हुई थी
सनसनाते हुए नम अंधेरे में पौरें धड़कने लगीं
ग़ार में महव-ए-परवाज़ पलकों के पंछी उलझने लगे

ग़ार में शाम थी
चंद लम्हों में सदियाँ बसर कर के जब
ग़ार के दौर से हम ज़माने में आए
तो ढलते हुए दिन की गीली चमक पत्थरों पर जमी थी
मुड़ के देखा तो पलकों को परवा लगी
और मख़मूर आँखों को सपना लगा
गूँजते ग़ार का नम अंधेरा हमें अपना अपना लगा
ग़ार ने कुछ तो जाने दिया कुछ हमें रख लिया था
निहायत सुबुकसार थे
ऐसे चलते थे जैसे ज़मीं के मकीं
कुर्रा-ए-माह पर चल रहे हों

शाम के पेड़ पर इक परिंदा
गजरतान भेरों में गाने लगा
वक़्त का साँवला पेड़ है
पेड़ के मल्गजे पात हैं
दिल के अपने ज़मान ओ मकाँ
शाम के अपने दिन रात हैं

  - Waheed Ahmad

Jalwa Shayari

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